कल्पना से परे और मॉरिशस का अप्रवासी घाट

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-जय प्रकाश मिश्र, पोर्ट लुईस, मॉरिशस से।

पलायन की पीड़ा क्या होती है। यह वही बता सकते हैं जिन्होंने अपने घर-बार, गांव-जवार, खेत-खलिहान, परिवार और अपने आंगन छोड़ कर रोजी-रोटी की तलाश में ‘बीर’ देश गए हों। जहां का कुछ भी अपना न हो। सब बेगाना लगे। क्या बीतता होगा और क्या बीते होंगे। यह कल्पना से परे है।

हिंद महासागर का एक देश है मॉरिशस । यहां के एक-एक कंकड़ पत्थर में दर्द की लंबी-चौड़ी दास्तां है। अंग्रेजों ने भारत के अलग-अलग प्रांतों से लोगों को यहां लाया। लेकिन, सबसे ज्यादा लोग बिहार-उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों से आए। वैसे आज भी इन इलाकों से पलायन जारी है। जो रूकने का नाम नहीं ले रहा है।

भारतीय लोगों को अंग्रेज ने मॉरिशस जिस घाट पर उतारा उसे पहले कुली घाट और अब इसे अप्रवासी घाट के नाम से जाना जाता है। यह मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुईस में स्थित है। मेरी मॉरिशस यात्रा के दौरान पोर्ट लुईस के इस अप्रवासी जाना हुआ है। जहां पत्थर दिल भी पिघल सकता है। आप अपने आप को रोक नहीं सकते हैं। आपकी आखें नम हो सकती हैं।

भारत के कलकत्ता भवानीपुर पोर्ट से मजदूरों का पहला खेप 2 नवंबर 1834 को पोर्ट लुईस के इसी कुली घाट (अप्रवासी घाट) पर पहुंचा। जहाज से उतरने के बाद 16 सीढ़ियों से बाहर लाया गया। छोटे-छोटे कमरे में उन्हें ठूस-ठूस कर रखा गया। करीब तीन से एक सप्ताह तक उन्होंने यहां रखा जाता था। प्रताड़ित किया जाता था।

अंग्रेजी शासन था लेकिन, अधिकांश अधिकारी व खेत मालिक फ्रांस मूल के थे। भाषा की परेशानी थी। भारतीय मजदूर भोजपुरी में बोलते थे और वे सब फ्रेंच में। तरह-तरह से यातानाएं दी जाती थी। ताकि वे दास बन सकें। घाट पर जिस तरह से भारतीय मजदूर को रखते थे उससे सैकड़ों गुणा अधिक सुविधा में उनके घोडों को रखते थे।

यह सब करने के बाद उन्हें अलग-अलग खेतों के बीच में बनें कैंप में भेजते थे। खेतों में बने कैंप के दासता की एक अलग दास्तां (अगली कड़ी में) इस अप्रवासी घाट पर खाने के लिए तरसाया जाता था। दूर से रोटी के टुकड़े फेकते थे। ऐसी जानकारी मिलती है कि एक परिवार या एक गांव के अगर-दो लोग साथ आए थे तो उन्हें अलग-अलग कैंप में भेजते थे। शायद ऐसा इसलिए करते थे कि सिर्फ काम करेंगे। अगर एक साथ रहेंगे तो आपस में बाते करेंगे और कहीं एक जुट हो जाएंगे।

पांच रूपए महीना मजदूरी मिलती थी। अगर एक दिन बीमार हो गए और काम नहीं किए तो दो दिन की मजदूरी कट जाती थी। ऐसी हजारों दर्द भरी कहानी है।

अप्रवासी घाट को यूनेस्कों ने विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है। मॉरिशस के लोगों के लिए यह घाट किसी तीर्थ से कम नहीं है। अभी हाल के दिनों में इस घाट पर हर 2 नवंबर को लोग हवन एवं पूजन करते रहे हैं। मॉरिशस सरकार घाट का संरक्षण करते हुए एक संग्रहालय के रूप में विकसित कर रही है।

अप्रवासी घाट की एक महिला अधिकारी जानकारी उपलब्ध करा रही थीं। वह जिस तरह से जानकारी उपलब्ध करा रही थीं। उनकी बातों में एक अनंत दर्द था। पूर्वजों की पीड़ा थी। कई बार बोलते- बोलते भावुक हो जाती थी। इससे मुझे यह साफ हो चुका था कि नई पीढ़ी ने अपने पूर्वजों कष्ट को भूला नहीं है।

अंत में जब उन्होंने एक पुस्तक थमाते हुए यह समझना चाहा कि कैसा लगा तब तक हम लोग ‘मुक’ थे। आंखे  नम थी और निशब्द थे।

 

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