मॉरीशस : दो देश, एक दिल

jagdishwar govardhan high commission of mauritius

भारत से तो खून का रिस्ता है। मॉरीशस में 80 प्रतिशत लोग तो यूपी और बिहार से ही गए हैं। हम लोगों की पहचान ही इन्हीं राज्यों और भोजपुरी भाषा से है। भले दो देश है मगर दिल तो एक ही है। भारत में मॉरीशस गणराज्य के उच्चायुक्त जगदीश्वर गोवर्धन से इंडिया व्यू के लिए जय प्रकाश की बातचीत का मुख्य अंश

वैसे तो उत्तर प्रदेश और बिहार में हर कोई आपसे परिचित है लेकिन, जब भी मॉरीशस की बात होती है तो लोग आपके विषय में चाव से जानना जाते हैं। आप अपने विषय में कुछ बताएं।

-(भोजपुरी और हिंदी के साथ क्रियोल मिक्स) अभी तो मैं मॉरीशस का भारत में उच्चायुक्त के तौर पर नियुक्त हूं लेकिन, 30 साल से मॉरीशस की सक्रिय राजनीति किया। 1976 से 2000 तक में मॉरीशस की संसद में पांच बार जीत कर प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है। कई वर्षों तक स्वास्थ्य मंत्री, को-ऑपरेटिव मंत्री और एमएसएमई मंत्री के रुप में काम करने का मौका मिला है। इस दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर हॉर्ट सर्जरी सेंटर बनाने का मौका मिला। इसको लेकर हमें यूनाइटेड नेशन (यूएन) से गोल्ड मेडल भी मिला। किसानों के हित के लिए 40 वर्षों से काम कर रहा हूं। आज भी मेरे दिलों-दिमाग में किसानों के बेहतरी की बात रहती है। फिलहाल जीरो बजट फार्मिंग को लेकर काम कर रहा हूं। तीन साल में मॉरीशस बायो फार्मिंग देश बने। यह मेरा लक्ष्य है।

-मॉरीशस में अधिकांश लोगों के पूर्वज यूपी और बिहार से गए हैं। आपके पूर्वज भारत के किस हिस्से से मॉरीशस गए थे। अभी आप अपने परिवार में किस पीढ़ी के हैं।

-सही बात है, मॉरीशस में भारत के विभिन्न हिस्सों से गए लोग ज्यादा है। उसमें भी भोजपुरिया लोगों की संख्या ज्यादा है। मेरे भी पूर्वज उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के नवापुर गांव से मॉरीशस मजदूर बनकर 1878 में गए थे।

-आप लोगों के पूर्वज मॉरीशस कैसे गए। उन लोगों कुछ संस्मरण जो आप साझा करना चाहते हों।

-बात उस समय की है जब मेरे परदादा ग्यारह माह के थे। उनका नाम गोबर्धन था। वे अपने मां सोमरिया और पिता ठाकुर के साथ गए थे। वे लोग कोलकत्ता से चार जून 1978 को एलोरा नाम के जहाज पर सवार हुए थे और 18 जून को मॉरीशस पहुंचे थे। वहां उने लोगों को डिपो में जानवरों की तरह रखा गया था। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी गई थी। आप इसी बात से अंदाजा लगा सकतें है कि 18 जून को मॉरीशस डिपो में पहुंचने के बाद 15 दिन छोटे-छोटे कमरों में रखा गया था। आप समझ सकते हैं कि 11 माह के मेरे परदादा गोबर्धन कैसे रहे होंगे। 3 जुलाई को उन्हें मॉरीशस फ्लॉक जिले में भेजा गया था। वहां वे लोग खेतिहर मजदूर के रुप में काम करते थे। खेत में काम करन से लेकर पत्थर तोड़ने तक का काम करते थे।

वे लोग 14 दिन तक समुंदर में रहे थे। जहाज में उन लोगों के साथ करीब दो सौ लोग और रहे होंगे। जहाज में खाने-पीने की कोई खास व्यवस्था नहीं थे। वे लोग अपने साथ सतुआ, भूजा, खाना-पीना के साथ-साथ खाने बनाने वाला वर्तन ले गए थे। 1830 से लेकर 1913 तक भारत से मजदूर मॉरीशस गए। मेरे पिता जी रामनारायण गोबर्धन भी वहां मजदूरी करते थे। बाद में उन्होंने 10 कट्टा जमीन अनुबंध पर लेकर खेती करना शुरू किए। बाद में धीरे-धीरे मेहनत के बल पर खेती की जमीन भी खरीदा। हम अपने छह भाई और चार बहन में सबसे छोटे हैं। जो आप लोगों के सामने हैं।

-आप लोगों के पूर्वज यूपी-बिहार से गए हैं तो यहां की तरह ही मॉरीशस में भी जाति व्यवस्था होगी।

-नहीं, ऐसा नहीं है। क्या आप मेरी जाति बात सकते हैं। हम आपने पूर्वज के नाम को ही अपना सरनेम रखते हैं। जैसे मेरे परदादा का नाम गोबर्धन था। मेरे नाम के साथ भी गोबर्धन जुटा हुआ है। हमारे यहां जहाजी भाई का रिस्ता है। हम भारत से गए हैं वहीं जाति, वहीं धर्म और वहीं सब कुछ है।

-आप भोजपुरी भाषा को लेकर काफी गंभीर हैं। अभी तक आपने क्या किया।

-सन 2002 में राजनीतिक पार्टी से बाहर आकर हमने भोजपुरी आंदोलन की शुरुआत की। 2014 तक हमने भोजपुरी से जुड़े दुनिया के तमाम देशों का दौरा किया। त्रिनिडाड एंड टबैगो, गयाना, फीजी, सूरीनाम अफ्रिका जैसे देशों में भोजपुरियां भाई लोगों को जागरुक किया। मॉरीशस में विश्व भोजपुरी सम्मेलन का सफल आयोजन कराया। करीब 10 प्रवासी भारतीय सम्मेलनों में हिस्सा लिया। 2008 में भोजपुरी की पढ़ाई शुरू कराने के लिए प्रयास किया। भोजपुरी की किताबों का वितरण किया और भोजपुरी शब्दकोश दिया। फ्री में करीब छह हजार बच्चों को भोजपुरी की शिक्षा दी गई और 500 शिक्षकों को भोजपुरी पढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। 2011 में हमने 50 दिन के लिए भारत के भोजपुरी इलाकों में यात्रा किया। सभी भोजपुरियां लोगों के साथ संवाद स्थापित किया। गांव-गांव की यात्रा किया। मॉरीशस में आज भोजपुरी भाषा को मान्यता प्राप्त है। भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन बना है।

-भोजपुरी को लेकर आगे की क्या योजना है ।

-दुनिया के 10 देशों में भोजपुरी इलाकों से मजदूर गए थे। उन देशों में भोजपुरी को मान्यता दिलाना है। आशा है कि भारत के साथ-साथ उन सभी देशों में भोजपुरी को मान्यता मिलेगी। जहां भोजपुरी के लोग बसे हुए हैं। मैं भारत के कार्यक्रमों में जाता हू तो नेता से लेकर कार्यकर्ता तक भोजपुरी की मान्यता को लेकर कितनी बेचैनी है।

मेरी इच्छा है कि नवंबर में वाराणसी में दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन हो। जिसके बाद सरकार से बातचीत कर वहां एक केंद्र का निर्माण किया जाए। ताकि मॉरीशस सहित दुनिया भर के लोग वहां आकर आपने जड़ की तलाश कर सकें।

-आप भारत के साथ कैसा संबंध देखना चाहेंगे।

-हमारी जन्म भूमि अफ्रीका है लेकिन, पूण्यभूमि भारत ही है। भारत एक ऐसा देश हैं जो धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रुप से दुनिया को रास्ता दिखा सकता है। भारत के साथ आर्थिक, राजनीतिक और आत्मिक संबंधों के आधार पर मॉरीशस में काफी उन्नति हुई है। इसी का नतीजा है कि अफ्रिका में मॉरीशस का स्थान सबसे आगे है।

-यूपी और बिहार के साथ आप कैसा संबंध रखना चाहते हैं।

-यूपी और बिहार से तो खून का रिस्ता है। मॉरीशस में 80 प्रतिशत लोग तो यूपी और बिहार से ही गए हैं।  हम लोगों की पहचान ही इन्हीं राज्यों और भोजपुरी भाषा से है। भले दो देश है मगर परिवार एक ही हैं। परिवार तो परिवार होता है।

-यूपी-बिहार के पिछड़े इलाकों के विकास में मॉरीशस की क्या भूमिका हो सकती है।

-देखिए, पहले से ही मॉरीशस और वहीं के लोग यूपी-बिहार के साथ सुख-दुख के साथी रहे हैं। लेकिन, सरकार की नई नीति से भारतीय मूल के सभी लोग भारतीय नागरिक की तरह ही हैं। अब वे लोग अपने गांव, अपने शहर और प्रांत की तरफ लौटकर विकास में सहभागी बनेंगे।

जब यूपी-बिहार, मॉरीशस के इतने करीब है तो बेटी-रोटी का संबंध क्यो नहीं शुरू होता।

-दुख की बात है कि भोजपुरिया लोग दुनिया के कई देशों में गए। संघर्ष के बाद लोग वहां राज कर रहे हैं। अब लोग अपने जड़ की तलाश में भी निकल रहे हैं। जब जड़ मिलेगा तो उनका गांव, परिवार और समाज मिलेगा। जब दो परिवारों का मिलावन होगा तो स्वभाविक है कि विवाह-शादी जैसे संबंधों की भी शुरुआत हो सकती है।

-आखिर में कोई ऐसा संदेश जो मॉरीशस की ओर से भोजपुरिया लोगों को देना चाहते हों।

-भोजपुरिया भाई लोगों के साथ तो परिवार का रिस्ता है। उनके साथ तो हमदर्दी हमेशा से रही है और आगे भी रहेगी…।

 

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