अब जीवन शैली में परिवर्तन लाकर ही कर सकते हैं करोना जैसे वायरस युद्ध से मुकाबला

COVID19

कुमार निशांत*

अब युद्ध तोपों से नहीं जैविक हथियारों से लड़े जायेंगे. करोना वायरस से  इस बात का  स्पष्ट संकेत मिलता हैं.जिससे पूरी दुनिया हिल गई है.देश के इतिहास में  शायद यह पहली बार हुआ है  कि सारा चीज  बंद है.चाह कर भी  कोई कुछ नहीं कर पा रहा है . लोगों की जान बचाने के लिए  घरों में रहना पड़ रहा है.सरकार द्वारा  गाइडलाइन जारी किए जा रहे हैं  कि आप अपने घरों में रहे.तभी आप सुरक्षित हैं . इससे विकट परिस्थिति क्या हो सकती है  कि आपका कोई अपना  कोरोना वायरस से  पीड़ित होकर  मौत को गले लगा लेता है  तो आप उसे ना देख सकते हैं  नाही  अपने रीति रिवाज के अनुसार  उसे जला सकते हैं  या दफना सकते हैं.

nishant ji

कुमार निशांत, वरिष्ठ पत्रकार, बिहार।

लॉक डाउन करें  1 महीने से  ऊपर हो गया है.  लोग घरों में कैद हैं. वह पूरी तरह से व्याकुल है. कैसे घरों से निकला जाए यदि कोई  बीमार पड़ जाए  कोई भी प्राइवेट  नर्सिंग होम  पेशेंट को  जल्दी एडमिट करने को  तैयार नहीं है. लोगपूरी तरह से डरे सहमे हुए हैं. अब क्या होगा.रास्ता नजर नहीं आ रहा है.अधिकांशत नर्सिंग होम  बंद है.सरकारी अस्पताल  राम भरोसे चल रहा है. एकाध मरीजों का तो इलाज हो रहा है. डाक्टर भी वायरस के कारण पूरी सावधानी बरत रहे हैं. यहां तक कि  सरकारी अस्पतालों में भी  मरीज  और मरीज के  साथ जाने वाले लोगों का  टेंपरेचर चेक किया जा रहा है .उसके बाद ही उन्हें  प्रवेश दिया जा रहा है.स्थिति  बद से बदतर हो गई है. कोई देखने वाला नहीं है. जनता पूरी तरह से परेशान हो चुकी है.सरकार दावे तो कर रही है.लेकिन जितना वह दावा कर रही है.  जमीन पर उसे  अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है. सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं. गरीबों को  खाने के लाले पड़ने लगे हैं.लोग पूरी तरह से घबरा गए हैं .ना जाने अब क्या होगा.हालांकि  सरकार ने  कुछ जगहों पर  ढील दी है. जिसके कारण कुछ काम हो पा रहे हैं.

लोगपूरी तरह से डरे सहमे हुए हैं. अब क्या होगा.रास्ता नजर नहीं आ रहा है.अधिकांशत नर्सिंग होम  बंद है.सरकारी अस्पताल  राम भरोसे चल रहा है. एकाध मरीजों का तो इलाज हो रहा है. डाक्टर भी वायरस के कारण पूरी सावधानी बरत रहे हैं. यहां तक कि  सरकारी अस्पतालों में भी  मरीज  और मरीज के  साथ जाने वाले लोगों का  टेंपरेचर चेक किया जा रहा है .उसके बाद ही उन्हें  प्रवेश दिया जा रहा है.स्थिति  बद से बदतर हो गई है. कोई देखने वाला नहीं है.

केंद्र सरकार ने  लाॅक डाउन के कारण फंसे लोगों को अपने राज्यों में लाने का आदेश दे दिया. लाखों लोगों को राहत मिलेगी. जो कहीं फस गए हो. उन्हें अपने घर तक जाने का मौका मिलेगा. गृह मंत्रालय ने राज्यों में नोडल ऑथर्टी नियुक्त करने का आदेश दिया.जिसमें लोगों को भेजने और लाने के लिए प्रोटोकॉल का निर्धारण किया जाए .लोगों को आने जाने की सहमति प्रदान की जाये. राज्यों की आपसी सहमति के बाद लोगों का आना जाना भी शुरू कर दिया जायेगा. भीड़ के कारण जो लोग फंस गए थे. उन्हें एक वायरस घर ले आया.जो लोग रोजी रोटी के लिए बाहर गए.  वह वापस अपने घरों को आने को तैयार है.जिस रोटी के लिए अपना गांव छोड़ दिए.आज उसी गांव में आने के लिए तरस रहे हैं.कई परिवार इधर-उधर भटक गए हैं.इससे बहुत लोग डर रहें हैं. हालाकि दूसरे प्रदेश से आने वाले लोगों को क्वारंटीन भी किया जा सकता है. सरकार द्वारा उठाएं जा रहे कदमों के बावजूद भी लोगों के मन में डर घर कर गया है. ऐसे में मुझे ओशो द्वारा कुछ कहीं बातें आप लोगों के समक्ष रख रहा हूं. शायद लोगों का डर खत्म हो.क्योंकि वायरस से बचना तो बहुत ही आसान है,लेकिन जो डर आपके और दुनिया के अधिकतर लोगों के भीतर बैठ गया है, उससे बचना बहुत ही मुश्किल है.अब इस महामारी से कम लोग, इसके डर के कारण लोग ज्यादा मरेंगे. ’डर’ से ज्यादा खतरनाक इस दुनिया में कोई भी वायरस नहीं है।इस डर को समझिये,

अन्यथा मौत से पहले ही आप एक जिंदा लाश बन जाएँगे.

यह एक सामूहिक पागलपन है, जो एक अन्तराल के बाद हमेशा घटता रहता है, कारण बदलते रहते हैं, कभी सरकारों की प्रतिस्पर्धा, कभी कच्चे तेल की कीमतें, कभी दो देशों की लड़ाई, तो कभी जैविक हथियारों की टेस्टिंग!!इस तरह का सामूहिक पागलपन समय-समय पर प्रगट होता रहता है.व्यक्तिगत पागलपन की तरह कौमगत, राज्यगत, देशगत और वैश्विक पागलपन भी होता है.इसमें बहुत से लोग या तो हमेशा के लिए विक्षिप्त हो जाते हैं या फिर मर जाते हैं हर समस्या मूर्ख के लिए डर होती है, जबकि ज्ञानी के लिए अवसर!!इस समय आप घर बैठिए, पुस्तकें पढ़िए, शरीर को कष्ट दीजिए और व्यायाम कीजिये, फिल्में देखिये, योग  कीजिये और एक माह में 15 किलो वजन घटाइए, चेहरे पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये अपने शौक़ पूरे कीजिए.

मुझे अगर 15 दिन घर  बैठने को कहा जाए तो में इन 15 दिनों में 30 पुस्तकें पढूंगा और नहीं तो एक बुक लिख डालिये, इस महामन्दी में पैसा इन्वेस्ट कीजिये, ये अवसर है जो बीस तीस साल में एक बार आता है पैसा बनाने की सोचिए….क्युं बीमारी की बात करके वक्त बर्बाद करते हैं…

ये ’भय और भीड़’ का मनोविज्ञान सब के समझ नहीं आता है।डर’ में रस लेना बंद कीजिए…आमतौर पर हर आदमी डर में थोड़ा बहुत रस लेता है, अगर डरने में मजा नहीं आता तो लोग भूतहा फिल्म देखने क्यों जाते?यह सिर्फ़ एक सामूहिक पागलपन है जो अखबारों और टीवी के माध्यम से भीड़ को बेचा जा रहा है…लेकिन सामूहिक पागलपन के क्षण में आपकी मालकियत छिन सकती है…आप महामारी से डरते हैं तो आप भी भीड़ का ही हिस्सा है.खबरे सुनना या अखबार पढ़ना बंद करें.ऐसा कोई भी विडियो या न्यूज़ मत देखिये जिससे आपके भीतर डर पैदा हो…महामारी के बारे में बात करना बंद कर दीजिए, डर भी एक तरह का आत्म-सम्मोहन ही है.एक ही तरह के विचार को बार-बार घोकने से शरीर के भीतर रासायनिक बदलाव  होने लगता है और यह रासायनिक बदलाव कभी कभी इतना जहरीला हो सकता है कि आपकी जान भी ले ले; बहुत कुछ दुनिया में हो रहा है, उन पर ध्यान दीजिए;ध्यान-साधना से साधक के चारों तरफ  एक प्रोटेक्टिव औरा बन जाता है, जो बाहर की नकारात्मक उर्जा को उसके भीतर प्रवेश नहीं करने देता है, अभी पूरी दुनिया की उर्जा नाकारात्मक  हो चुकी  है…….ऐसे में आप कभी भी इस ब्लैक-होल में  गिर सकते हैं….ध्यान की नाव में बैठ कर हीं आप इस झंझावात से बच सकते हैं।शास्त्रों का अध्ययन कीजिए, साधना कीजिए, विद्वानों से सीखें आहार का भी विशेष ध्यान रखिए, स्वच्छ जल पीए,धीरज रखिए…जल्द ही सब कुछ बदल जाएगा…….जब  तक मौत आ ही न जाए, तब तक उससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है और जो अपरिहार्य है उससे डरने का कोई अर्थ भी नहीं  है, डर एक  प्रकार की मूढ़ता है, अगर किसी महामारी से अभी नहीं भी मरे तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा, और वो एक दिन कोई भी  दिन हो सकता है, इसलिए विद्वानों की तरह जीयें, भीड़ की तरह  नहीं!!ऐसा पहले भी हजारों बार हुआ है, और आगे भी होता रहेगा और आप देखेंगे कि आने वाले बरसों में युद्ध तोपों से नहीं बल्कि जैविक हथियारों से लड़ें जाएंगे।

(लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं। आर्यावर्त, आज, छिंदवाड़ा टाइम्स, माया जैसे नामीचन संस्थाओं में वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके हैं। फिलहाल ऑनलाइन पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। यह लेखक का निजी विचार है।)

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