सरस्वती पूजा में है पीले रंग विशेष महत्व, जाने कैसे करते हैं पूजन

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इंडिया व्यू ब्यूरो।

नई दिल्ली। 22 जनवरी 2018 को बसंत पंचमी है। बसंत का अर्थ है वसंत और पंचमी का मतलब है पांचवा जिस दिन यह त्योहार मनाया जाता है। हिन्दू समाज में माता सरस्वती साहित्य, संगीत, कला तथा विद्या की देवी के रुप में प्रतिष्ठित हैं। यह मान्यता है कि शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने-लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता के महत्त्व को समझने के लिए भी सरस्वती पूजन की परम्परा है।

सरस्वती को वीणापुस्तक धारिणी कहा गया है। उनमें भाव, विचार एवं संवेदना का त्रिविध संगम है। जहां वीणा संगीत की वहीं पुस्तक विचारों की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है।

इस त्योहार पर पीले रंग का बहुत महत्व है, बसंत का रंग पीला होता है जिसे बसंती रंग के नाम से जाना जाता है। जोकि समृद्धि, ऊर्जा, प्रकाश और आशावाद का प्रतीक है. यही कारण है कि लोग इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनते हैं और पीले रंग के व्यंजन बनाते हैं।

माता सरस्वती का स्वरूप

सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। दोनों हाथों में वीणा धारण की हुई है। वीणा संगीत, भाव-संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है। तीसरे हाथ में पुस्तक है जो विद्या की प्रतीक है यह विद्या रुपी ज्ञान अपूर्व है जो संचय करने पर घटता है तथा व्यय करने पर बढ़ता है। अन्य हाथ में माला है जो ईश्वर के प्रति निष्ठां तथा सात्त्विकता का बोधक है। हंसवाहिनी कहा जाता है अर्थात इनके वाहन हंस है। मयूर-भी इनका वाहन है जो मनोरम सौन्दर्य का प्रतीक है।

सरस्वती पूजा कैसे करना चाहिए ?

माँ सरस्वती की पूजा करने वाले को सबसे पहले सरस्वती की प्रतिमा को शुद्ध या नवीन श्वेत वस्त्र पर अपने सामने रखना चाहिए। पूजा आरम्भ करने से पहले अपने आपको तथा आसन को इस मंत्र से शुद्घ करना चाहिए –

ऊं अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥

इन मंत्रों को पढकर अपने ऊपर तथा आसन पर तीन-तीन बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगाने चाहिए। पुनः निम्न मंत्र से आचमन करना चाहिए। ऊं केशवाय नम: ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, बोलकर फिर हाथ धोनी चाहिए। उसके बाद फिर से आसन शुद्धि मंत्र बोलने चाहिए ।

ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

आसन शुद्धि और आचमन के बाद चंदन का तिलक लगाना चाहिए। तिलक हमेशा अनामिका उंगली से ही लगाना चाहिए। चन्दन लगाते समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

चन्दानस्य् महत्पण्यिम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्याम् लक्ष्मीम तिष्ठ:तु सर्वदा।

पुनः इसके बाद सरस्वती पूजन के लिए संकल्प लेनी चाहिए बिना संकल्प लिए की गयी पूजा सफल नहीं होती है इसलिए संकल्प जरूर लेनी चाहिए। संकल्प लेने के बाद हाथ में फूल ( श्वेत पुष्प जरूरी होता है) अक्षत, फल और मिष्ठान लेकर ‘यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये |’  इस मंत्र का उच्चारण करते हुए हाथ में रखी हुई सामग्री मां सरस्वती के सामने समर्पित कर देना चाहिए। इसके बाद गणपति जी की पूजा विधिवत करे पुनः कलश पूजा करनी की पूजा करनी चाहिए।

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