बिहार नियोजित शिक्षकों की वेतन मामले की सुनवाई टली, अब 12 जुलाई तक का इंतजार

SUPREME COURT

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में ‘समान काम, समान वेतन’ के मामले की अगली सुनवाई अब 12 जुलाई को होगी। इस मामले की सुनवाई मंगलवार को हुई है। कोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह में कंप्रीहेंसिव एक्शन स्कीम से संबंधित हलफनामा पेश करने करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने सरकार से यह भी कहा है कि वह ऐसी योजना लाये, जिससे बिहार ही नहीं, बल्कि समान काम के लिए समान वेतन मांगनेवाले अन्य प्रदेश के सभी शिक्षकों का भी भला हो सके। इसके लिए केंद्र सरकार के साथ बिहार सरकार बात करें।

अटार्नी जरनल केके वेणुगोपाल की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह का समय। कोर्ट ने सुनवाई के लिए 12 जुलाई की तिथि तय कर दी।

ज्ञात हो कि बिहार के साढ़े तीन लाख से ज्यादा नियोजित शिक्षकों की मांग को जायज ठहराते हुए पटना हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर, 2017 को समान काम के लिए समान वेतन लागू करने का आदेश दिया था। लेकिन, राज्य सरकार ने पैसे की कमी का होना बताते हुए फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गयी।

इस तरह समझें।

शिक्षकों के नियोजन की शुरुआत वर्ष 2003 में थी। उस समय नियोजित शिक्षकों को शिक्षामित्र के नाम से जाना जाता था। तब उन्हें मानदेय के रुप में 1500 रुपये दिया जाता था। एक जुलाई,  2006 को नीतीश कुमार की सरकार ने सभी शिक्षामित्रों को पंचायत और प्रखंड शिक्षक के तौर पर समायोजित करते हुए ट्रेंड नियोजित शिक्षकों का वेतन पांच हजार और अनट्रेंड नियोजित शिक्षकों का वेतन चार हजार रुपये कर दिया। उसके बाद से बिहार में नियोजित शिक्षकों की बहाली लगातार होती रही। अब इनकी संख्या साढ़े तीन लाख से ज्यादा हो चुकी है। शिक्षकों को दिये जानेवाले वेतन का 70 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार को भुगतान करना पड़ता है।

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